Monday, 12 July 2021

' टूटा तारा ' सुकून देता गीत

 अक़्सर गीत सुनता हूँ  | अधिक समय पुराने गीतों को सुनता हूँ और ख़ुद को सुकून पहुंचाता हूँ | आप-सभी को लग रहा होगा अपनी बातों से फिर बोर करूँगा , तो चलिए शुरू करता हूँ |  आज शाम से लगभग 20 बार एक ही गीत सुना हूँ , यूँ कहूं तो 100 मिनट उसी गीत में ख़ुद को डूबा रक्खा | आज-ही (12 July) रिलीज़ हुई है , 'Kumaar ' का लिखा गीत है और Stebin Ben की आवाज़ और Sham Balker का संगीत | जी म्यूजिक से रिलीज़ इस गीत के बोल है ' टूटा तारा  ' | मैं समीक्षक नहीं हूँ , बस बतौर प्रसंशक के रूप में इस गीत के बारे में लिख रहा हूँ |  शुरूआती बोल ही गीत का मजबूर कर देता है कि  इस गीत पूरा सुना जाए |  " ख़्वाहिश पूरी करता है, खत्म ये दुरी करता है  " गीत यहीं से शुरू होता है , अलाव जल रहा होता है और खुली आसमान के नीचे तारों के बीच इस गीत को शुरू किया गया है | यूँ तो हम सभी ने टूटता तारा देखा होगा , पर जब आप इस गीत के बोल को अच्छी तरीके से समझने का प्रयास करेंगे तो सच कहूं आपको अहमियत पता चलेगी टूटते तारों का | गिटार के धुनों के संग गाने का शुरुआत सुकून देता है | गीत के रचनाकार ने गीत के बोलो को बहुत ही शानदार तरीके से रचा है | हर शब्द जैसे मन के भीतर पहुँच हमें टूटने पर भी कैसे सम्भलना है , सीख दे जाती है | इस गीत को सुनते हुए में तो ख़ुद कुछ देर रुक गया, 2मिनट 47 सेकंड पर जब एक्टर के द्वारा अपने बैग को ख़ुद से लगाना यह संदेश देता है कि जब हम तन्हा और ख़ुद को अकेले पाते है या यूँ कहूं तो टुटा महसूस करते है तो ख़ुद को कैसे संभालना है या यूँ कहूं तो सांत्वना देनी है | गाने के बोल तो सुकून देते ही है , पर जब आप गाने की वीडियो को देखते है तो 2मी.41 सेकंड पर आपको चादर पर अच्छे पेंटिंग का नमूना भी देखने को मिलेगा | इस गीत के बोल में इमोशन भी और कहीं-न-कहीं मोटिवेशन भी की जब हम टूटते है तो फिर किस प्रकार उठ खड़े हो फिर | एक जगह बोल है ' रह ना सका जब तेरे बिन ' , ना जाने ये बोल तारों की अहमियत को बयान करती है | अगर मैं यूँ कहूं तो बहुत दिनों के बाद मैंने इस तरह का गाना सुना जो सुकून दे गया मन को ||

नवीन आशा

Wednesday, 30 June 2021

मन के लिए

 


मन हारता नहीं,

नाराज़ हो जाता 

बिन कहे,

नाराज़गी इस बात से,

कि ख़ुद के होंठों 

पर हँसी गायब कर 

लेता हूँ 

तल्खी इस बात की ,

कि मैं ख़ुद को कमजोर 

समझ लेता हूँ 

रूठ बैठा बिन कहे,

क्योंकि मैं राहों में 

ख़ुद को अकेला समझ 

लेता हूँ ,

मन अक़्सर इशारों में,

कई बातों से रु-बरु करवा 

जाता 

हाँ मन मेरी धड़कनों को 

समझ 

मेरी राहों को स्वप्नों से 

सजाता 

मन हारता नहीं ,

मन नाराज़ हो जाता 

सच है जब मन नाराज़ 

हो जाता,

तो ना जाने ख़ुद की आँखों में 

ख़ुद ही मैं औझल हो जाता 

मन हारता नहीं 

मन नाराज़ होता जाता 

#नवीनआशा#मन#सेल्फमोटिवेशन 



Thursday, 7 January 2021

 ठाकुर हवेली, तेजपुर पर,  लिखी थी ये कविता |  आज आप सभी के सम्मुख प्रस्तुत है | अपनी राय अवश्य प्रस्तुत करें ||



बहन 
लड़ती भी,
झगड़ती भी, 
पर सच ये भी है 
भाई की सफल जीवन 
को ले अक़्सर 
जी-भर प्रार्थना भी करती 
वो ||
बहन,
रूठती भी,
मनाती भी 
सच ये भी है लेकिन,
उदास जब देखे भाई 
का चेहरा 
चुपके नीर बहाती भी ||
बहन,
वो मार्ग है जीवन का,
जो ज्योति बन , मार्गदर्शित 
कर जाती अक़्सर ||
बहन,
पागल-मुर्ख भी कह जाती,
मन आनंदित फिर भी हो जाता 
बहन,
नहीं देखती भाई गरीब वा है 
अमीर 
वो हर-पल हँसी के बंधन 
में बाँध अक़्सर,
मुस्कराहट से भाई को,
सदैव रखती अमीर ||
बहन,
लड़ती भी 
.............. ||


नवीन आशा 


Saturday, 31 October 2020

 बेटियों को समर्पित यह कविता | लक्ष्मी का वो रूप होती है बेटियाँ जो सदैव अपने पिता के हृदय के समीप होती है | आप-सभी पाठक राय अवश्य दें | 


मैं निराश था जीवन में ,
तकलीफ़ की आहट चहोंदिशा 
थी ,
पर एक दिन किलकारी गूँजी ,
ईश्वर ने दिया अलमोल तोहफ़ा ,
घर को संपूर्णता मिली , आदिशक्ति 
स्वरूपा ने जो जन्म लिया 
पहली दफ़ा जब नन्ही-सी गुड़िया को,
गोद में लें पुचकारा 
हर दर्द जैसे उसी पल रुख़सत पा लिया ||
बेटियाँ घर के हर कोने की संगीत होती है,
पिता की वो प्रेरणा होती है, जो स्वप्न को 
जगा उसे पूर्ण करने का हौसला देती है ,
बेटियाँ वो मुस्कान होती है, जिसमें माता-पिता की 
छुपी जान होती है ||
बेटियाँ अलंकार है उन छंदों का,
जिसके बिना हर अभिभावक की कविता 
अधूरी होती है 
बेटियाँ वो शाम होती जीवन की,
जब थके-हारे पिता दफ्तर से आ,
उनके हाथों से पानी पी अक़्सर ,
हर थकावट ख़ुद से दूर पा लेते 
पुत्री के स्नेह और चरण की दस्तक ,
जीवन में अगर हो जाए 
जो हर स्वप्न सच हो जाता 
जान-प्राण होती है बेटियाँ,
माँ-पिता का अभिमान होती है बेटियाँ ||

नवीन आशा 


Friday, 30 October 2020

 " नई ज़िंदगी " सोनू माही द्वारा रचित ये कविता ' प्रथम कविता प्रतियोगिता-2020' में सांत्वना पुरस्कार हेतु चयनित किया गया है | यह कविता ज़िंदगी की अहमियत  का संदेश देते दिख रही है | आप-सभी अपनी राय अवश्य दें |

नई ज़िंदगी 

चलो, एक ज़िंदगी और जीते है 
ग़म के आलम में थोड़ी ख़ुशियाँ 
बिखराते है,
उदास चेहरे को हँसी से चमकाते है,
चलो, एक ज़िंदगी और जीते है ||
अपनों के संग वक़्त बिताकर ,
चलो पुरानी बातों को याद करते है 
चलो ,एक ज़िंदगी और जीते है ||
रिश्तों की बुनियाद को ज़रा गंभीरता 
संग लेते है,
चलो, इस बंधन को थोड़ा मज़बूत कर,
अपनों को मोहित करते है 
चलो, एक ज़िंदगी और जीते है ||
काल्पनिक दुनिया से बाहर निकल,
वास्तविकता को गले लगा खुशियाँ 
सजाते है 
चलो, एक ज़िंदगी और जीते है ||


सोनू माही 
दरभंगा, बिहार 





Friday, 23 October 2020



प्रस्तुत है " पतझड़ ", सुश्री कृतिका शर्मा के द्वारा लिखीं इस कविता में जीवन की सच्चाई दिखती है | " प्रथम कविता प्रतियोगिता-2020" में सुश्री शर्मा की इस कविता को सांत्वना पुरस्कार हेतु चयनित किया गया है | यह कविता पतझड़ के बहाने 'महत्वता ' को समझाने का कार्य कर रही दिखती है | आप-सभी पाठक अपनी राय अवश्य दें |




शाखों ने जगह नहीं दी उस पत्ते को,
ना ही हवाओं ने उसे रोका,
टूट गया फिर वो सब से,
दूर कहीं खो गया,
अवारा सा घूमता था,
बेपरवाह सा झूमता,
बेफिक्र हो गई ज़िन्दगी,
अनजाना सा सफ़र हो गया,
किसी ने ना ढूंढा उसे,
किसी ने ना पूछा,
इस पतझड़ के मौसम में,
वो पता नहीं कहाँ सो गया ||



कृतिका शर्मा
अम्बाला, हरियाणा










तुलनात्मक अध्ययन

 मेरे शब्द आजकल कम हो गए , लगता है जैसे राह में हम अकेले  हो गए  तुलनात्मक अध्ययन की राह में  रख दिया है हमको  कहो मेरी मुस्कान पर भी अब हर ...