अधिकार
अक़्सर तानों का डेरा रहता,
लड़की हूँ ये कह कर हर वक़्त
जीने का अधिकार हमसे छिना
जाता ?
लड़की हो क्या करोगी पढ़कर,
पढ़-लिख भी तो चूल्हा तुम्हें ही
जलाना होगा ।
लड़की हूँ तो क्या अरमान मेरे
मन के भीतर ना उभरे,
क्यों अक़्सर लड़की कह मुस्कुराने
का अधिकार भी जग हमसे छिने ?
मौका अगर मिले बेटीयों को आसमान में
ख़ुद के बल विचरण कर लेंगी ,
फिर क्यों राह चलते हर कोई बेटी होने
का तंज दे जाते अक़्सर ?
बेटी घर की होती लक्ष्मी
ये तो अक़्सर हमने सुना है ,
फिर क्यों भाई के कंधे से कन्धा मिला
चलने पर
बेटी कुलक्षणी कहलाती है ?
पिता की लाडली बन हर सम्मान
दिलाने की ज़ज़्बा रखती है बेटियाँ,
फिर क्यों अक़्सर अपने ही घर में
दुलार-प्यार से वंचित रहती है बेटियाँ ?
एक बार मौका दे देखो नाज़ करोगे
बेटी पर,
मान बढ़ाएंगी-कुल का दीपक जलाएंगी
बूढ़े पिता का श्रवण कुमार कहलाएंगी
आखिर कब-तक अग्नि के ताप में यूँ
ख़ुद को जला मुस्कुराए एक लड़की ,
दो तो एक मौका समाज का नाम बढ़ाये
एक लड़की
यूँ अबला बन उसे बूत ना बनाओं ,
जग की शान होती एक लड़की
घर का दीपक होती एक लड़की
फिर क्यों अक़्सर तानों के घेरे में
ख़ुद को रख
बिना किसी सहारे चलती एक लड़की ||
निवेदिता पांडेय,
Mau , U,P





